🕉️ शिव चालीसा
॥ जय गिरिजा पति दीन दयाला ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥1॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥2॥
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥3॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥4॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥5॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥6॥
नन्दी गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥7॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥8॥
देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुःख प्रभु आप निवारा ॥9॥
किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥10॥
तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥11॥
आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥12॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहि कृपा कर लीन बचाई ॥13॥
किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥14॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदा हीं ॥15॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥16॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए बिहाला ॥17॥
कीन्ही दया तहँ करी सहाई।
नीलकंठ तब नाम कहाई ॥18॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥19॥
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥20॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥21॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥22॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी ॥23॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥24॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥25॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो ॥26॥
मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥27॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी ॥28॥
धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥29॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥30॥
शंकर हो संकट के नाशन।
विघ्न विनाशन मंगल कारण ॥31॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
नारद शारद शीश नवावैं ॥32॥
नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥33॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥34॥
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावै मुक्ति सारी ॥35॥
रोग दोष दुख नासै नित।
हरै कष्ट शिव भक्तन हित ॥36॥
शिव चालीसा जो नित गावै।
सो भक्त शिवलोक पावै ॥37॥
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥1॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥2॥
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥3॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥4॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥5॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥6॥
नन्दी गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥7॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥8॥
देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुःख प्रभु आप निवारा ॥9॥
किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥10॥
तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥11॥
आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥12॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहि कृपा कर लीन बचाई ॥13॥
किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥14॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदा हीं ॥15॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥16॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए बिहाला ॥17॥
कीन्ही दया तहँ करी सहाई।
नीलकंठ तब नाम कहाई ॥18॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥19॥
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥20॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥21॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥22॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी ॥23॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥24॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥25॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो ॥26॥
मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥27॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी ॥28॥
धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥29॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥30॥
शंकर हो संकट के नाशन।
विघ्न विनाशन मंगल कारण ॥31॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
नारद शारद शीश नवावैं ॥32॥
नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥33॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥34॥
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावै मुक्ति सारी ॥35॥
रोग दोष दुख नासै नित।
हरै कष्ट शिव भक्तन हित ॥36॥
शिव चालीसा जो नित गावै।
सो भक्त शिवलोक पावै ॥37॥
🙏 शिव चालीसा का महत्व
शिव चालीसा का नियमित पाठ करने से भय, रोग, कष्ट और मानसिक अशांति दूर होती है। सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है।


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